 *आज दि.25.10.17का काॅलम* 
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*STORY OF THE DAY-" _ *ज्ञान पंचमी की आराधना*
 *ज्ञान पंचमी से जुडी प्रचलित कथा...भाव एवं क्रिया ( कार्य ) के द्वारा कर्म-बंधन का अनुपम उदारहण...*
★ *" सभी दुखों का कारण अज्ञान और मोह है। जीवन में मंगल के लिए इनका विसर्जन होना अनिवार्य है "*
भरतखंड में अजितसेन राजा का वरदत्त नामक एक पुत्र था, वह राजा का अत्यंत दुलारा था। उसका बोध (ज्ञान) नहीं बढ़ पाया, अच्छे कलाविदों एवं ज्ञानियों आदि के पास रखने पर वह ज्ञानवान नहीं बन सका l
उसकी यह स्थिति देखकर राजा बहुत खिन्न रहता था, सोचता था की मुर्ख रहने पर यह प्रजा का पालन किस प्रकार करेगा...?
*राजा अजितसेन ने सोचा -"* मैंने पुत्र उत्पन्न करके उसके जीवन-निर्माण का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लिया है, अगर इस दायित्व को मैं ना निभा सका तो पाप का भागी होऊँगा l√
इस प्रकार सोचकर राजा ने पुरस्कार देने की घोषणा करवाई की जो कोई विद्वान उसके राजकुमार को शिक्षित कर देगा उसे यथेष्ट पुरस्कार दिया जाएगा, मगर कोई भी विद्वान् ऐसा नहीं मिला जो उस राजकुमार को कुछ सिखा सकता, राजकुमार कुछ भी ना सीख सका...उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर ही रहा l
शिक्षा के अभाव के साथ उसका शारीरिक स्वास्थ भी खतरे में पड़ गया, उसे कोढ़ का रोग लग गया। लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगे... सैंकड़ों दवाएँ चलीं, पर कोढ़ ना गया, ऐसी स्थिति में विवाह-सम्बन्ध कैसे हो सकता था...? कौन अपनी लड़की उसे देने को तैयार होता...?
एक सिंहदास नामक सेठ की लड़की को भी दैवयोग से ऐसा ही रोग लग गया, उस सेठ की लड़की गुणमंजरी भी कोढ़ से ग्रस्त हो गयी, वह लड़की गूँगी भी थी, उस काल में, आज के समान गूंगों, बहरों और अंधों की शिक्षा की सुविधा नहीं थी । कोई लड़का उस लड़की के साथ सम्बन्ध करने को तैयार नहीं हुआ । गूँगी और सदा बीमार रहने वाली लड़की को भला कौन अपनाता...?
 एक बार भ्रमण करते हुए विजयसेन नामक एक धर्माचार्य वहाँ पहुँचे, वे विशिष्ट ज्ञानवान थे और दुःख का मूल कारण बतलाने में समर्थ थे, वे नगर के बाहर एक उपवन में ठहरे । ज्ञान की महिमा के विषय में उनका प्रवचन प्रारम्भ हुआ l
 *उन्होंने कहा - " सभी दुखों का कारण अज्ञान और मोह है। जीवन के मंगल के लिए इनका विसर्जन होना अनिवार्य है।" आचार्य महाराज की देशना पूरी हुई l*
सिंहदास श्रेष्टि ने उनसे प्रश्न किया -महाराज ! मेरी पुत्री की इस अवस्था का क्या कारण है...? किस कर्म के उदय से यह स्थिति उत्पन्न हुई है...? आचार्य ने उत्तर में बतलाया - ● "इसने पूर्वजन्म में ज्ञानावर्णीय कर्म का गाढ़ बंधन किया है।"
*>> वृत्तांत कहानी  इस प्रकार है - -*
जिनदेव की पत्नी सुंदरी थी, वह पाँच लड़कों और पाँच लड़कियों की माता थी । सबसे बड़ी लड़की का नाम लीलावती था। घर में संपत्ति की कमी नहीं थी, उसने अपने बच्चों को इतना लाड़प्यार किया की वे ज्ञान नहीं प्राप्त कर सके । सुंदरी सेठानी के बच्चे समय पर पढ़ते नहीं थे। बहानेबाजी किया करते और अध्यापक को उल्टा त्रास देते थे। जब अध्यापक उन्हें उपालंभ देता और डांटता तो सेठानी उस पर चिड़ जाती। एक दिन विद्द्याशाला में किसी बच्चे को सजा दी गयी तो सेठानी ने चंडी का रूप धारण कर लिया। पुस्तकें चूल्हे में झोंक दीं और दूसरी सामग्री नष्ट-भ्रष्ट कर दी । उसने बच्चों को सीख दी - शिक्षक इधर आवे तो लकड़ी से उसकी पूजा करना।हमारे यहाँ किस चीज़ की कमी है जो पोथियों के साथ माथा पच्ची की जाए...? कोई आवश्यकता नहीं है पढने-लिखने की l
सेठानी के कहने से लड़के पढ़ने नहीं गए । दो-चार दिन बीत गए, शिक्षक ने इस बात की सूचना दी तो सेठ ने सेठानी से पूछा, सेठानी आगबबूला हो गयी और बोली - मुझ पर क्यों लांछन लगाते हो - लड़के तुम्हारे, लडकियां तुम्हारी... तुम जानो तुम्हारा काम जाने l
पति पत्नी के बीच इस बात को लेकर खींचतान बढ़ गयी । खींचतान ने कलह का रूप धारण किया और फिर पत्नी ने अपने पति पर कुंडी से प्रहार कर दिया l
 *आचार्य बोले - गुणमंजरी वही सुंदरी है... ज्ञान के प्रति तिरस्कार का भाव होने से यह गूँगी रूप में जन्मी है l*
*राजा अजितसेन* ने भी अपने पुत्र वरदत्त का पूर्व वृत्तांत पुछा। कहा - भगवन ! अनुग्रह करके बतलाइये की राजकुल में उत्पन्न होकर भी यह निरक्षर और कोढ़ी क्यों है...?
 *आचार्य ने अपने ज्ञान का उपयोग कर कहा - वरदत्त ने भी ज्ञान के प्रति दुर्भावना रखी थी। इसके पूर्व जीवन में ज्ञान के प्रति घोर उदासीनता की वृति थी l*
श्रीपुर नगर में वसु नाम का सेठ था।उसके दो पुत्र थे - वसुसार और वसुदेव। वे कुसंगति में पड़कर दुर्व्यसनी हो गए, शिकार करने लगे। वन में विचरण करने लगे और निरपराध जीवों की हत्या करने में आनंद मानने लगे। एक बार वन में सहसा उन्हें एक मुनिजन के दर्शन हो गए। पूर्व संचित पुण्य का उदय आया और संत का समागम हुआ l
इन कारणों से दोनों भाइयों के चित्त में वैराग्य उत्पन्न हो गया। दोनों पिता की अनुमति प्राप्त करके दीक्षित हो गए, दोनों चारित्र की आराधना करने लगे l
शुद्ध चारित्र के पालन के साथ वसुदेव के ह्रदय में अपने गुरु के प्रति श्रद्धाभाव था, उसने ज्ञानार्जन कर लिया।कुछ समय पश्चात गुरूजी का स्वर्गवास होने पर वह आचार्य पद पर प्रतिष्टित हुआ... शासन सूत्र उसके हाथ में आ गया l
उधर वसुसार की आत्मा में महामोह का उदय हुआ, वह खा-पीकर पड़ा रहता, संत कभी प्रेरणा करते तो कहता कि - निद्रा में सब पापों की निवृति हो जाती है। निद्रा के समय मनुष्य ना झूठ बोलता है, ना चोरी करता है, ना अब्रह्म का सेवन करता है, ना क्रोधादि करता है, अतएव सभी पापों से बच जाता है, इस प्रकार की भ्रांत धारणा उसके मन में बैठ गयी। वसुसार अपना अधिक समय निद्रा में व्यतीत करने लगा l
वसुदेव ने गुरुभक्ति के कारण तत्त्वज्ञान प्राप्त किया था, अतः वह आचार्य पद पर आसीन हो गए थे। जिज्ञासु संत सदा उन्हें घेरे रहते थे, कभी कोई वाचना लेने के लिए आता तो कोई शंका के समाधान के लिए... उन्हें क्षणभर का भी अवकाश नहीं मिलता। प्रातःकाल से लेकर सोने के समय तक ज्ञानाराधक साधू-संतों की भीड़ लगी रहती । मानसिक और शारीरिक श्रम के कारण वसुदेव थक कर चूर हो जाते थे। सहसा उनको विचार आया की छोटा भाई वसुसार ज्ञान नहीं पढ़ा, वह बड़े आराम से दिन गुजारता है। मैंने सीखा, पढ़ा तो मुझे क्षण भर भी आराम नहीं। विद्वानों ने ठीक कहा है - "पढने से तोता पिंजरे में बंद किया जाता है, और नहीं पढ़ने से बगुला स्वच्छन्द घूमता है। मेरे ज्ञान-ध्यान का क्या लाभ...? अच्छा होता भाई की तरह मैं भी मुर्ख ही होता, तो मुझे भी कोई हैरान नहीं करता l
कहा जाता है की इस प्रकार ज्ञानाराधना से थक कर उसने 3-3 दिन के लिए बोलना बंद कर दिया। कर्मोदय के कारण वसुदेव के अंतःकरण में दुर्भावना आ गयी, उसने ज्ञान की विराधना की, इस प्रकार दीक्षा एवं तपस्या के प्रभाव से उसने राजकुल में जन्म ले लिया किन्तु ज्ञान की विराधना करने  से कोढ़ी और निरक्षरता प्राप्त की l
  _*धर्म बोध...  ज्ञान की विधिवत आराधना करने से और ज्ञान की भक्ति करने से कोढ़ तो क्या... अगाढ़ घाती कर्म भी नष्ट हो जाते है... ऐसा जिनवाणी का  कथन है l*_
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 *जय जिनेंद्र*
 *आपका दिन मंगलमय हो*
 *प्रेषक-भरत एन.कोठारी*
            भायंदर/कोसेलाव
   *मो.*-9892408771
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*भक्ति के नये रंग नयी तरंग नये आगाज के साथ सूरों के बिखरे रंग धारवाड़ की पुण्यनगरी में......*










*♦धारवाड़ की धन्यधरा पर पर प.पु.गुरुदेव आ.श्री महेन्द्रसागरसुरीश्वरजी म.सा. के आर्शीवाद से शा केवल
चंदजी सुखराजजी ललवाणी एवं मातुश्री लीलाबाई केवलचंदजी ललवाणी के जीवन मे किए सुकृत के अनुमोदनार्थ एवं साथ ही ललवाणी परिवार में हुई सिद्धि तप व मासक्षमण की तपश्चर्या के वैयावच्च निमित त्रिदिवसीय जिवित महोत्सव,एवं भव्य जिनभक्ति के कार्यक्रम सह हर्षोल्लास के साथ संपन्न*

♦श्रीमती लीलाबाई केवलचंदजी ललवानी के जीवितमहोत्सव ओर उनके परिवार में किये तीन माक्षखमण और दो सिद्धितप तपस्या निमित्त भव्य महोत्सव के तहत दो तीन दिन भव्य भक्ति व एक दिन भव्यातिभव्य मातृ-पितृ वंदनावली का आयोजन किया गया जिसमे भक्ति का रंग जमाया सूरो के जादूगर संगीत सम्राट विपिनजी पोरवाल एवं सुप्रसिद्ध ओजस्वी युवा मंचसंचालक भरतजी कोठारी ने

♦जिन भक्ति और जीवित महोत्सव उत्सव तो बहुत होते हैं ।लेकिन किसी भी उत्सव महोत्सव मैं भक्ति में चार चाँद तब लगते है जब दिल से शब्दों और भावों के साथ मिलकर संगीत की मिठी तान जब भक्त और भगवान को रिझाए और आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन हो ।तब जाकर उत्सव सफल होता है ।

♦ठीक वैसा ही नजारा ललवाणी परिवार द्वारा आयोजित जीवित महोत्सव मे देखने को मिला ।

♦ललवाणी परिवार ने तो उत्सव आयोजित करके पुण्य का कार्य किया। उनके परिवार की में खुब -खुब अनुमोदना करता हूँ ।

♦साथ ही साथ इस कार्यक्रम को सफल बनाने में जो महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर पूरे त्रिदिवसिय कार्यक्रम को चार चाँद लगाकर भक्तों को अपने शब्दों से सम्मोहित कर भक्ति में चार चाँद लगाकर सोने पे सुहागा का काम किया भरतजी कोठारी और विपिनजी पोरवाल ने 

♦जिन भक्ति और माता-पिता वंदनावली में भरतजी का शब्दों के सटीक संयोजन के साथ सधा हुआ मंच संचालन एवं विपिनजी की नेह नितरती जादुई आवाज सीधा भगवान के साथ कनेक्ट करती है और उन्हें समाधि भाव की और ले जाता है।

♦विपिनजी पोरवालऔर भरतजी कोठारी की ये युगल जोडी आने वाले समय में जिन शासन मे भक्ति संगीत की दुनिया मे डंका बजाते हुए नये आगाज, अंजाम और आयाम बनाएगे ।
ऐसा सबका मानना है।

♦विपिनजी द्वारा गाए भक्ति गीत और दिल छू लेने वाले माँ-बेटी के गीत सबके मन को मोह लिया ।

♦धारवाड में सभी का मानना था कि ऐसी जिन भक्ति ना पहले देखी ना सुनी ।इतनी जोरदार भक्ति धारवाड में पहली बार हुई ।
जिनमे भक्त करीबन लास्ट तक नही उठे।ऐसी भक्ति को वर्षो तक याद रखा जायेगा

♦उपरोक्त महोत्सव के तहत तीन दिन भव्य भक्ति व एक दिन भव्यातिभव्य मातृ-पितृ वंदनावली का आयोजन किया गया जिसमे भक्ति का रंग जमाया सूरो के जादूगर संगीत सम्राट विपिनजी पोरवाल एवं सुप्रसिद्ध मंच संचालक भरतजी कोठारी ने
मात-पिता वंदनावली में जिस तरह से विपिनजी पोरवाल ने गीत गाये।वहाँ पर बैठे सभी भक्तों की आंखे भर आयी।

♦अद्भुत अदभूत अविस्मरणीय भक्ति का जोरदार कार्यक्रम जो वर्षों वर्ष धारवाड के भक्त याद रखेंगे इतना जोरदार धमाकेदार कार्यक्रम रहा।

♦प्रथम दिन 4.9.17सोमवार को सुबह पूजन व रात्रि मे तपस्वियो के अनुमोदनार्थ जिन भक्ति की धूम संगीतकार सुबोधजी परमार एवं भरतजी कोठारी ने भव्य भक्ति का कार्यक्रम पेश किया।

♦दूसरे दिन दि.5.9.17 को 108 श्री पार्श्व-पूजन एवं रात को प्रभु भक्ति स्वर सम्राट सूरों के जादूगर विपिनजी एवं अपनी वाक् छटा से सबको बाँध कर रखने में माहिर भरतजी कोठारी ने क्या रंग जमाया देखते ही बनता था।

♦तीसरे दिन सुबह माता-पिता वंदनावली और पार्श्वनाथ पूजन और रात को भक्ति भावना का बरसो बरस याद रहे ऐसा महाभक्ति कार्यक्रम संगीत की सूरावलियों के साथ संपन्न हुआ।
कुल मिलाकर ललवानी परिवार द्वारा धारवाड में नया इतिहास बना जो आने वाले वर्षों तक याद रखा जायेगा।

* सुरेश ललवानी*

🙏 *आज दि.6.9.17का काॅलम* 🙏
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*STORY OF THE DAY-"बदनामी*

🔹मनीषा नहा कर निकली ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी।द्वार खोला सामने बहुत खूबसूरत लगभग 40,42 साल की महिला थी।

🔹" जी कहिये,आप कौन? मैने आप को पहचाना नहीं।"
"वो मयंक त्रिपाठी हैं क्या?मैं उनकी बहन मैत्रेयी हूँ।"
"जी वो अभी आते ही बल्कि आ गए,कहते हुए उसने झुक कर चरण स्पर्श किया।"

🔹मयंक भी आश्चर्य से उन्हें देख रहा था बिल्कुल माँ की छवि बहुत ही सुंदर और ममतामयी।झुक कर प्रणाम किया।बोल अब भी नही पा रहा था।

🔹अचानक उठकर उन्होंने उसे गले लगा लिया और रो पड़ी।20 वर्ष पूरे 20 वर्ष बाद वो उसे गलेे लगा रही थी।

🔹"मयंक में तुम्हारी दीदी हूँ,जब तुम 6 साल के थे हम बिछड़ गए थे,तुम सोच रहे होंगे माँ पिता की मौत पर नही आई और आज,पर मैं मजबूर थी। आज मैं तुम्हे सब बता देना चाहती हूँ।क्या तुम मेरी कहानी सुनोगे।

🔹हाँ, दीदी पर आप अभी तो आयी हैं।आराम से बैठ जाएं।"
नहीं भाई वैसे ही बहुत देर हो गई है,और आज तो मैं जल्दी में भी हूँ।तो सुनो -

🔹"मैने विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था।लोग कहते मैं बहुत सुंदर थी,न होती तो अच्छा होता।उसी कॉलेज में अभिजीत राणा भी पढ़ता था।"

🔹"पहले ही दिन उसकी दबंगई के चर्चे सुने पर मुझे क्या ।मैने सोच लिया उसके सामने ही नहीं पड़ना।मै थर्ड ईयर में आ गई।और वो थर्ड ईयर में ही रह गया था फेल हो कर।"
और बस शायद यहीं से मेरा दुर्भाग्य शुरू हो गया।"
"पहले ही दिन उसने पूछा-क्या नाम है तुम्हारा ।
" जी मैत्रेयी त्रिपाठी।"
"मैत्रेयी सिंह क्यों नही।"
कहकर उसने और उसके आवारा दोस्तों ने ठहाका लगाया लगाया।
"चलो आज से हम फ्रेंड्स। हाथ मिलाओ।

🔹मैने हाथ जोड़ दिए।और फिर जोरो की हंसी।ऐसा लगा में वहीं बेहोश हो कर गिर जाऊंगी। पर फिर वो चले गए।

🔹अब जहां भी वो मिलता बहुत सभ्यता से हेलो मैत्रेयी कहता।और में जल जाती।क़भी फिर उसने मुझे डराने की कोशिश नही की, मैं निश्चिंत हो गई।
"पर नही उसकी शैतानी खोपड़ी में से मेरा खयाल निकला नही था।"

🔹"अंतिम प्रश्नपत्र दे कर मैं अपनी सहेली के साथ निकली ही थी कि वो मेरे सामने खड़ा हो गया और बोला - अब तो परीक्षा समाप्त और अब तुम बताओ कब आऊं तुम्हारे पिताजी से बात करने।"

🔹मैं रुआंसी हो आयी मैने कहा - देखो हम उच्च कुल के ब्राह्मण हैं मेरे पिताजी कभी नही मानेंगे।वो मुझे मार देंगे पर ठाकुरों में नही ब्याहेंगे।तुम मुझ पर रहम करो।"

🔹"ठीक है चलो फिर यही सही कहकर उसने मुझे अपने मजबूत हाथों में उठाया और गाड़ी में डाल दिया।मेरी सहेली वसुधा से कहा - तीन दिन के लिए शहर से बाहर हो जाओ किसी को कुछ बताया तो सोच लेना।"

🔹"वसुधा घर जाकर तुरंत अपनी मौसी के घर चली गई। पिताजी के पूछने पर उसकी माँ ने कह दिया परीक्षा दे कर वहीं से वो अपनी मौसी के घर चली गई थी।"

🔹"पिताजी रात भर परेशान रहे सुबह जाकर रिपोर्ट लिखाई तो पुलिस के असभ्य प्रश्न- कोई चक्कर तो नहीं था कि भाग गई हो।पंडित जी आजकल की लड़कियों का कोई भरोसा नही।"
"और अगले दिन अखबार में छपा राणा अभिजीत ने ब्राह्मण कन्या से प्रेम विवाह रचाया। उनके पिता अर्जुन सिंह ने भी दिया आशीर्वाद पिता जी ने ये पढ़ते ही आत्मदाह कर लिया।"
"माँ पागल सी हो गई।और में कुछ न कर पा रही थी।ये सब सुनकर राणा ने कहा तुम चलना चाहो तो मैं तुम्हे ले चलूँ तुम्हारे घर। पर में माँ का सामना कैसे करती।और फिर में जिस माहौल में पहुंच गई थी कल को तुम भी उसी में जुड़ जाते,इसलिए मैंने दिल पर पत्थर रख लिया।"

🔹"बहुत क्रूर परिवार था अभिजीत का उसके पिता भाई सब बात बात पर गली गलौज,मारामारी और गोली तक से परहेज नही करते थे।"
"पर अभिजित पर कुछ माँ का असर था।कठोर था पर कभी मुझ पर हाथ नही उठाया।15 20 हजार रुपये दे देता पर कभी पूछता नही था।"

🔹"पिता जी की मौत के 4 महीने बाद मुझे मां से बात करने का मौका मिला। सब शादी में गए थे बस दो नौकर और मेरी दो दासियाँ ही थी।मैने माँ को फ़ोन किया और उनसे कहा - फ़ोन मेरी बात सुने बिना मत काटना।मैने माँ को सारी बात बताई ,माँ ने समझा भी पर उन्होंने कहा- मुझे सब पहले बताना चाहिए था।यद्यपि हम उनका फिर भी कुछ कर न पाते।पर तेरे कारण तेरे पिता की जान गई, मैं तुझे माफ नही कर सकती।"

🔹"मैं समझ चुकी थी की अब मै माँ से कभी नही मिल पाऊँगी,औऱ भाई के लिए मुझे कुछ करना है।
"मैने पिताजी के एक मित्र से बात की और तुम्हारी पढ़ाई की व्यवस्था हो गई।मैं हर माह 15 हजार बैंक खाते में भेज देती थी।"

🔹"तुम्हारी पढ़ाई खत्म हुई नौकरी लगी।और माँ ने शादी भी कर दी पर मुझे नही पूछा।पर मैं खुश थी,तुम्हारी खुशी में।"
"तीन साल पहले अभिजीत के भाई को किसी ने मार दिया। पिता भी नही रहे।और अभिजीत भी अब कुछ सुधर गया है।मेरे दोनो बच्चे इंटर में है एक बेटी और एक बेटा।"

🔹"अब मैने सोचा चलकर तुम्हे भी सब कुछ बता कर एक बार क्षमा मांग लूँ शायद मुझे मेरा मायका वापस मिल जाये।"

🔹"अब तक दोनो चुपचाप सुन रहे थे। अचानक जैसे नींद से जागे।मनीषा दौड़ कर मैत्रेयी के गले लग गई। और बोली - दीदी आपने कितना दुःख सहा जबकि आपकी कोई गलती नहीं थी।
"ये आपका ही घर है जब जी चाहे, आप आएं।औरअपना आशीष बनाये रखें। मयंक उसकी गोद मे सिर रखकर सुबक रहा था।"

🔹कहानी का उद्देश्य -लड़कियों को कभी भी कुछ भी अपने माँ पिता से छुपाना नही चाहिए छोटी बात भी बड़ी समस्या बन सकती है।
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🙏 *प्रेषक-भरत एन.कोठारी*🙏
            भायंदर/कोसेलाव
   *मो.*-9892408771

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आज धारवाड़ (कर्नाटक) में भक्ति संगीतसम्राट श्री विपिनजी पोरवाल की अगुवाई में भव्य भक्ति के पहले दिन का कार्यक्रम संपन हुआ।कार्यक्रम का मंच संचालन करने का मौका मुझे मिला।

























कल भायंदर के वेंकटेश पार्क में भव्य प्रभु भक्ति संगीतसम्राट श्री विपिनजी पोरवाल(बैंगलोर) ओर मंच संचालक भरत एन. कोठारी के नेतृत्व में संपन हुई। भक्ति करीबन रात को 2बजे तक चली।खचाखच भरे पांडाल में विपिनजी ने जब गाना शुरू किया तो उनके  एक-एक गीत पर खूब तालिया बजी।और भक्ति का आलम ये रहा कि वहाँ पर बैठे हर भक्त दांतो तले अंगुली दबाने लगे।खुद संघ के ट्रस्टी मांगीलालजी को कहना पड़ा कि वेंकटेश पार्क के इतिहास में पहली बार इस भक्ति ने सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले।भक्ति और काफी देर तक चलती लेकिन पुलिस प्रशासन के हिसाब से भक्ति को बंध करना पड़ा।वेंकटेश पार्क संघ का खुब-खूब आभार













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