🙏 *आज दि.6.9.17का काॅलम* 🙏
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*STORY OF THE DAY-"बदनामी*

🔹मनीषा नहा कर निकली ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी।द्वार खोला सामने बहुत खूबसूरत लगभग 40,42 साल की महिला थी।

🔹" जी कहिये,आप कौन? मैने आप को पहचाना नहीं।"
"वो मयंक त्रिपाठी हैं क्या?मैं उनकी बहन मैत्रेयी हूँ।"
"जी वो अभी आते ही बल्कि आ गए,कहते हुए उसने झुक कर चरण स्पर्श किया।"

🔹मयंक भी आश्चर्य से उन्हें देख रहा था बिल्कुल माँ की छवि बहुत ही सुंदर और ममतामयी।झुक कर प्रणाम किया।बोल अब भी नही पा रहा था।

🔹अचानक उठकर उन्होंने उसे गले लगा लिया और रो पड़ी।20 वर्ष पूरे 20 वर्ष बाद वो उसे गलेे लगा रही थी।

🔹"मयंक में तुम्हारी दीदी हूँ,जब तुम 6 साल के थे हम बिछड़ गए थे,तुम सोच रहे होंगे माँ पिता की मौत पर नही आई और आज,पर मैं मजबूर थी। आज मैं तुम्हे सब बता देना चाहती हूँ।क्या तुम मेरी कहानी सुनोगे।

🔹हाँ, दीदी पर आप अभी तो आयी हैं।आराम से बैठ जाएं।"
नहीं भाई वैसे ही बहुत देर हो गई है,और आज तो मैं जल्दी में भी हूँ।तो सुनो -

🔹"मैने विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था।लोग कहते मैं बहुत सुंदर थी,न होती तो अच्छा होता।उसी कॉलेज में अभिजीत राणा भी पढ़ता था।"

🔹"पहले ही दिन उसकी दबंगई के चर्चे सुने पर मुझे क्या ।मैने सोच लिया उसके सामने ही नहीं पड़ना।मै थर्ड ईयर में आ गई।और वो थर्ड ईयर में ही रह गया था फेल हो कर।"
और बस शायद यहीं से मेरा दुर्भाग्य शुरू हो गया।"
"पहले ही दिन उसने पूछा-क्या नाम है तुम्हारा ।
" जी मैत्रेयी त्रिपाठी।"
"मैत्रेयी सिंह क्यों नही।"
कहकर उसने और उसके आवारा दोस्तों ने ठहाका लगाया लगाया।
"चलो आज से हम फ्रेंड्स। हाथ मिलाओ।

🔹मैने हाथ जोड़ दिए।और फिर जोरो की हंसी।ऐसा लगा में वहीं बेहोश हो कर गिर जाऊंगी। पर फिर वो चले गए।

🔹अब जहां भी वो मिलता बहुत सभ्यता से हेलो मैत्रेयी कहता।और में जल जाती।क़भी फिर उसने मुझे डराने की कोशिश नही की, मैं निश्चिंत हो गई।
"पर नही उसकी शैतानी खोपड़ी में से मेरा खयाल निकला नही था।"

🔹"अंतिम प्रश्नपत्र दे कर मैं अपनी सहेली के साथ निकली ही थी कि वो मेरे सामने खड़ा हो गया और बोला - अब तो परीक्षा समाप्त और अब तुम बताओ कब आऊं तुम्हारे पिताजी से बात करने।"

🔹मैं रुआंसी हो आयी मैने कहा - देखो हम उच्च कुल के ब्राह्मण हैं मेरे पिताजी कभी नही मानेंगे।वो मुझे मार देंगे पर ठाकुरों में नही ब्याहेंगे।तुम मुझ पर रहम करो।"

🔹"ठीक है चलो फिर यही सही कहकर उसने मुझे अपने मजबूत हाथों में उठाया और गाड़ी में डाल दिया।मेरी सहेली वसुधा से कहा - तीन दिन के लिए शहर से बाहर हो जाओ किसी को कुछ बताया तो सोच लेना।"

🔹"वसुधा घर जाकर तुरंत अपनी मौसी के घर चली गई। पिताजी के पूछने पर उसकी माँ ने कह दिया परीक्षा दे कर वहीं से वो अपनी मौसी के घर चली गई थी।"

🔹"पिताजी रात भर परेशान रहे सुबह जाकर रिपोर्ट लिखाई तो पुलिस के असभ्य प्रश्न- कोई चक्कर तो नहीं था कि भाग गई हो।पंडित जी आजकल की लड़कियों का कोई भरोसा नही।"
"और अगले दिन अखबार में छपा राणा अभिजीत ने ब्राह्मण कन्या से प्रेम विवाह रचाया। उनके पिता अर्जुन सिंह ने भी दिया आशीर्वाद पिता जी ने ये पढ़ते ही आत्मदाह कर लिया।"
"माँ पागल सी हो गई।और में कुछ न कर पा रही थी।ये सब सुनकर राणा ने कहा तुम चलना चाहो तो मैं तुम्हे ले चलूँ तुम्हारे घर। पर में माँ का सामना कैसे करती।और फिर में जिस माहौल में पहुंच गई थी कल को तुम भी उसी में जुड़ जाते,इसलिए मैंने दिल पर पत्थर रख लिया।"

🔹"बहुत क्रूर परिवार था अभिजीत का उसके पिता भाई सब बात बात पर गली गलौज,मारामारी और गोली तक से परहेज नही करते थे।"
"पर अभिजित पर कुछ माँ का असर था।कठोर था पर कभी मुझ पर हाथ नही उठाया।15 20 हजार रुपये दे देता पर कभी पूछता नही था।"

🔹"पिता जी की मौत के 4 महीने बाद मुझे मां से बात करने का मौका मिला। सब शादी में गए थे बस दो नौकर और मेरी दो दासियाँ ही थी।मैने माँ को फ़ोन किया और उनसे कहा - फ़ोन मेरी बात सुने बिना मत काटना।मैने माँ को सारी बात बताई ,माँ ने समझा भी पर उन्होंने कहा- मुझे सब पहले बताना चाहिए था।यद्यपि हम उनका फिर भी कुछ कर न पाते।पर तेरे कारण तेरे पिता की जान गई, मैं तुझे माफ नही कर सकती।"

🔹"मैं समझ चुकी थी की अब मै माँ से कभी नही मिल पाऊँगी,औऱ भाई के लिए मुझे कुछ करना है।
"मैने पिताजी के एक मित्र से बात की और तुम्हारी पढ़ाई की व्यवस्था हो गई।मैं हर माह 15 हजार बैंक खाते में भेज देती थी।"

🔹"तुम्हारी पढ़ाई खत्म हुई नौकरी लगी।और माँ ने शादी भी कर दी पर मुझे नही पूछा।पर मैं खुश थी,तुम्हारी खुशी में।"
"तीन साल पहले अभिजीत के भाई को किसी ने मार दिया। पिता भी नही रहे।और अभिजीत भी अब कुछ सुधर गया है।मेरे दोनो बच्चे इंटर में है एक बेटी और एक बेटा।"

🔹"अब मैने सोचा चलकर तुम्हे भी सब कुछ बता कर एक बार क्षमा मांग लूँ शायद मुझे मेरा मायका वापस मिल जाये।"

🔹"अब तक दोनो चुपचाप सुन रहे थे। अचानक जैसे नींद से जागे।मनीषा दौड़ कर मैत्रेयी के गले लग गई। और बोली - दीदी आपने कितना दुःख सहा जबकि आपकी कोई गलती नहीं थी।
"ये आपका ही घर है जब जी चाहे, आप आएं।औरअपना आशीष बनाये रखें। मयंक उसकी गोद मे सिर रखकर सुबक रहा था।"

🔹कहानी का उद्देश्य -लड़कियों को कभी भी कुछ भी अपने माँ पिता से छुपाना नही चाहिए छोटी बात भी बड़ी समस्या बन सकती है।
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🙏 *प्रेषक-भरत एन.कोठारी*🙏
            भायंदर/कोसेलाव
   *मो.*-9892408771

✍🏼पोस्ट  में कोई चेंज ना करे ।अदत्तादान का पाप लगता है जैसी है वैसी ही पोस्ट  करें 🙏⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛⌛

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